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God has given you fixed time to breathe — never forget that.
 

ईश्वर ने आपको निश्चित संख्या में ही साँसें दी हैं। इसे कभी मत भूलिए।

यात्रा में सम्मिलित होने से पहले एक बात समझना आवश्यक है—
इस यात्रा का आपका प्रयोजन क्या है?
क्या यह केवल एक पर्यटन यात्रा है?
या इसके पीछे कोई गहरा और अनसुना प्रश्न छिपा है?

यदि यह प्रश्न आपके मन में उठा है, तो समझिए कि आप सामान्य विचारों से आगे बढ़ चुके हैं।
जैसा कि मैंने पहले कहा—
बिना प्रयोजन के मनुष्य शरीर धारण ही नहीं करता।
हर जन्म, हर घटना, हर मिलन—सबका एक अर्थ, एक संदेश, एक दिशा होती है।

देवभूमि की यात्रा भी कोई साधारण यात्रा नहीं।
यह पूर्वनिर्धारित, पूर्वनिर्मित, और पूर्वचयनित होती है।
तय समय, तय मार्ग, और तय यात्री—सब कुछ पहले से ही तय होता है।

यात्रा में जो भी आपके साथ चलता है—वह सिर्फ़ यात्री नहीं,
वह आपका आत्मिक परिवार है।
एक वह परिवार जो खून से बनता है, और एक यह जो महादेव के चयन से बनता है।

आपका इस यात्रा के लिए चयन होना भी एक सौभाग्य है—
जिसकी नींव आपके पूर्वज रखते हैं,
लेकिन यह यात्रा पूरी होगी या नहीं—
यह केवल और केवल महादेव के अधीन है।

क्या आपने कभी सोचा है कि जो सांस हमें ईश्वर ने दी है,
उसके समाप्त होने के बाद हम कहाँ जाते हैं?
यह एक गूढ़ रहस्य है—जानना आवश्यक नहीं,
क्योंकि यह शरीर महादेव की देन है,
और उसी का इस पर आधिपत्य भी।

यह यात्रा धार्मिक भी है,
और कर्म की भी।
धर्म और कर्म के संयोग से जो फल बनता है,
वही तय करता है कि आपकी देवभूमि यात्रा कब और कैसे प्रारम्भ होगी।

जब मैं इन संस्मरणों को जोड़ने का प्रयास करता हूँ,
तो मुझे यह आभास होता है—
कि रामायण और महाभारत के समय से लेकर आज तक मनुष्य की मूल भावनाओं में कोई परिवर्तन नहीं आया है।
चेहरे बदले हैं, पर भावनाएँ वही हैं।
संघर्ष वही, प्रश्न वही, खोज वही।

इसलिए यह यात्रा—
मनुष्य को समझने की यात्रा है,
खुद को समझने की यात्रा है,
और इस सृष्टि के रचनाकार को समझने की यात्रा है।

विश्वास कीजिए—
हम इस धरती पर सिर्फ़ कुछ समय के लिए आए हैं।
इस यात्रा में आपके सम्मिलित होने का अर्थ यही है कि
आप कुछ पल मौन होकर समय के आईने में खुद को देखें—
और आप पाएँगे कि यह यात्रा आपकी अपनी यात्रा है।

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